प्रवेश हेतु महत्वपूर्ण सूचना

गुरुकुल परिचय

श्रुति विज्ञान आचार्यकुलम संस्कृत और संस्कृति के उत्थान के प्रति समर्पित, एक प्राचीन परंपराओं पर चलने वाली संस्था है। यहाँ पारंपरिक अध्ययन के साथ आधुनिक अध्ययन, आयुर्वेद, कृषि, गौपालन और पारंपरिक 64 कलाओं पर प्रशिक्षण दिया जाता है, जो हमारे जीवन को चलाने का आधार हैं।

प्रवेश

संस्था में वर्तमान में 10 वर्ष से 12 वर्ष की आयु के बालकों को प्रवेश दिया जाता है। प्रवेश हेतु बालकों की लिखित, मौखिक या क्रियात्मक परीक्षा की जाती है, परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर, आरम्भ में अस्थाई प्रवेश दिया जाता है, जो एक महीने से लेकर 3 महीने तक रहता है, उसके बाद बच्चे की स्थिरता, माता पिता की सहमति को देखते हुए वही प्रवेश स्थाई प्रवेश में बदल दिया जाता है।

छात्रावास

श्रुतिविज्ञान आचार्यकुलम पूर्णतया आवासीय संस्था है। यहीं पर रह करके छात्र अध्ययन करते हैं। अतः हर एक छात्र छत्रावास में रहता है(यह अनिवार्य है) और उसकी एक निश्चित दिनचर्या रहती है जो प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त से आरम्भ हो कर रात्रि के प्रथम प्रहर की समाप्ति प्रयन्त रहती है। छात्रावास में सभी छात्रों के लिए भोजन की व्यवस्था सामान रूप से रहती है। जिसमें प्रातः काल नाचता, मध्यान्न में भोजन और पुनः सांयकाल भोजन और रात्रि में दूध की व्यवस्था होती है। माता-पिता अपने बालकों के लिए कुछ भी भोजन, खान-पान आदि की वस्तुएं देना चाहते हैं तो वो समान रूप से सभी छात्रों को दी जाती हैं अतः किसी भी छात्र को अपने व्यक्तिगत रूप से खाने के लिए अलग कोई भी चीज रखने की अनुमति नहीं है और न ही बाजार की कोई चीज़ माता पिता उन्हें लाकर दे सकते हैं। कुछ भी खाने-पीने की चीज़ संगरक्षक या आचार्य की अनुमति से ही माता पिता बच्चों के लिए ला सकते हैं और वो सभी बच्चों के लिए होंगी। छात्रावास में भोजन लगभग पूर्णतया विषमुक्त (organic) भोजन होता है, जो काफी महंगा होता है। आश्रम में उत्पन्न हुई सब्जियां, आश्रम की गौशाला का घी, दूध और आश्रम की अपनी कृषि से उत्पन्न हुए अन्न, ये सब विद्यार्थियों को मिलते हैं और जो चीज़ हमारे पास उपलब्ध नहीं होती वो बाजार से लेते हैं और उसमें भी प्राथमिकता ऐसे अन्न की होती है जो विषमुक्त हो।

शुल्क

श्रुति विज्ञान आचार्यकुलम में अध्ययन के लिए वर्तमान में कोई शुल्क नहीं लिया जाता और न ही छात्रावास में निवास का कोई शुल्क होता है। नियमित रूप से भोजन का पूरा व्यय जो समय-समय पर निर्धारित किया जाता है, वो माता पिता के द्वारा देय रहेगा। इसके अतिरिक्त प्रवेश शुल्क, पुस्तक आदि या चिकित्सा का व्यय या छात्र कभी गुरुकिल की तरफ से कहीं भ्रमण के लिए जाते हैं, तब वह व्यय माता पिता के द्वारा देय रहेगा। यदि किसी कारण किसी छात्र की कोई अनुपस्तिथि होती है तो उसके लिए दंड शुल्क के रूप में 500 रूपये प्रति दिन के अनुसार देय होगा, जो सभी के लिए अनिवार्य रहेगा। 

श्रमदान तथा कार्य व्यवस्था

प्रत्येक विद्यार्थी को गुरुकुल में रह कर प्रतिदिन कुछ समय श्रम के लिए देना होगा।  ये भी शिक्षा का एक अंग है, इसमें गौशाला के कार्य , कृषि के कार्य, आश्रम की सफाई या अन्य कोई भी कार्य जो उनको व्यावहारिक रूप से जीना सिखाते हैं, वो सभी कार्य इसमें करवाए जाते हैं।  इसके  साथ आयुर्वेद सम्बन्धी कार्य भी होते हैं जैसे कि औषद निर्माण, चिकित्सालय में की जाने वाली चिकित्सा के अंगों को समझना और चिकित्सा सम्बन्धी यथा योग्य कार्य करना। 64 कलाओं के अंतर्गत आने वाले विभिन्न कार्य, जो जीवन को उत्कृष्ट बनाने वाले होते हैं तथा आय का साधन बनते हैं जिससे व्यक्ति जीवन यापन करता है, वो सभी कार्य गुरुकुलीय व्यवस्था का अंग हैं और वो विद्यार्थियों के लिए नियमित रूप से अनिवार्य होते हैं। 

गुरुकुल में विद्यार्थी विभिन्न शारीरिक व्यायाम करते हैं साथ ही गुरुकुल में वर्तमान में होने वाली अनेक प्रकार कि क्रीड़ाओं में भी भाग लेते हैं जैसे योगासन, मलखम, प्राणायाम, शूटिंग, आर्चरी आदि। अन्य क्रीड़ाओं को भी इसमें जोड़ने का प्रयास है, जिसमें प्राचीन युद्ध कलाएं आदि रहेंगी।

अवकाश

विद्यार्थियों को ग्रीष्मकालीन अवकाश 15 से 20 दिन का दिया जाता है, इसके अतिरिक्त माता पिता के आग्रह पर और आचार्य की अनुमति अनुसार विद्यार्थियों को अवकाश मिल सकता है, परन्तु वह किसी विशेष परिस्तिथि के लिए और बहुत ही काम समय के लिए दिया जाता है। यदि विद्यार्थी अनुमति से अधिक समय अवकाश के रूप में घर पर रहता है तब उस स्तिथि में प्रतिदिन 500 रूपये दण्डशुल्क के रूप में लिया जाता है और उसकी भी सीमा समय से अधिक हो जाने पर आचार्य के मत अनुसार उस विद्यार्थी को गुरुकुल से हटाया भी जा सकता है।

विद्यालय त्याग

किसी भी विद्यार्थी को सत्र के मध्य में जाने की अनुमति नहीं रहेगी। सत्र पूरा होने पर ही गुरुकुल को छोड़ कर जाने की आज्ञा दी जाएगी। नौंवी कक्षा के छात्र को दसवीं कक्षा पूर्ण करने तक और ग्यारहवीं कक्षा के छात्र को बारहवीं कक्षा पूर्ण करने तक, गुरुकुल में ही रहना अनिवार्य होगा। यदि छात्र सत्र के मध्य में जाता है,  ऐसे विद्यार्थियों के माता पिता को वो सब व्यय गुरुकुल को देने होंगे जो कि गुरुकुल ने उनसे नहीं लिए जैसे कि अध्यापन शुल्क, छात्रावास का निवास शुल्क, भवन शुल्क आदि यह सभी शुल्क संस्था द्वारा निर्धारित होंगे ।

 

गुरुकुल में रहते हुए और गुरुकुल से बाहर जाकर भी गुरुकुल से जुड़े हुए सभी विद्यार्थियों से अपेक्षा की जाती है कि वो एक मर्यादित जीवन जीएं। गुरुकुल में रहते हुए उन्हें नियमों का पालन करना होगा जो कि संस्था या आचार्यों द्वारा निर्धारित किये गए हैं और गुरुकुल से जाने के बाद भी उन आदर्श नियमों को विद्यार्थी अपने जीवन में अपनाये रखे जिससे उसका जीवन सही बना रहे। विद्यार्थी को सभी के साथ प्रेम पूर्वक, मृदुता से, आदर और सम्मान देते हुए व्यवहार करना होगा और यही अपेक्षा माता पिता से रहेगी कि वह गुरुकुल के अध्यापक और आचार्यों के साथ बड़े प्रेम से आदर पूर्वक व्यवहार करें। संस्था को अधिकार होगा कि वो किसी भी विद्यार्थी को जिसका या जिसके माता पिता का व्यवहार अनुचित है ऐसे विद्यार्थी को सत्र के मध्य में या कभी भी गुरुकुल से हटाया जा सकता है। 

यह गुरुकुल एक पारम्परिक गुरुकुल है। यहाँ पर कुछ सामान्य विद्यालयों की अपेक्षा कुछ विशेष नियम रहते हैं।  अतः माता पिता के सहयोग और अनुकूलता की अपेक्षा हमें सदा रहती है जिससे की बालक के अच्छे भविष्य का निर्माण किया जा सके। 

गुरुकुल में अनिवार्य रूप से संस्कृत पढ़ना सभी के लिए निश्चित किया गया है अतः माता-पिता या छात्र यह आग्रह नहीं कर सकता कि वह संस्कृत विषय को छोड़ कर अन्य विषय पढ़ना चाहता है। संस्कृत विषय में व्याकरण, साहित्य, दर्शन , आयुर्वेद इत्यादि कुछ भी हो सकता है जो गुरुकुल् या सम्बंधित बोर्ड निर्धारित करता है उसके अनुसार छात्र और माता पिता को अनुकूलता बना कर रखनी होगी। 

 

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